Thursday, August 8, 2013

ये हास्य कविता मैंने मम्मी पर लिखी थी ,मम्मी महिला समीति में बहुत सारे प्रतियोगिता में भाग  लेती और इनाम अवश्य लेकर आती / मैं चाहती हूँ  मम्मी आज भी उसी उत्साह से अपने जीवन को जियें , पापा का भी योगदान रहता था उनकी तै यारी करवाने मे// मैं उस वक़्त उनको ध्यान से देखती थी और शायद तभी वो कविता में वर्णन कर डाला

सुनिए सुनिए एक मजेदार किस्सा
 बन गई है किसी के जीवन की
 ये हास्य घटना

उन्होंने, उन्होंने ,
फैंसी ड्रेस में भाग लेने का सोचा
डायलाग का काम अपने
पतिदेव पर सौपा
और खुद एक्टिंग  का काम शुरू किया
घंटा भर अभ्यास किया
तब जाकर एक सुंदर सा
 नारी पात्र  तैयार हुआ

देखा मैंने उनको मटकते हुए
हाथ चमकाते हुए
कानो में झुमका
और बाल बाँ धे हुए

जल्दी से मैंने किये खड़े अपने कान
और पूछा " क्या चल रहा है आज?"
जवाब मिला " जमादारिन"
कल मुझे इसी का पात्र निभाना है
महिला समिति की फैंसी  ड्रेस में जाना है

"कैसा रहेगा?" उन्होंने पूछा
"कैसा रहेगा जब बगल में टोकरी ,
हाथ में झाड़ू  और
साथ में मेरा
मनुआ रहेगा?"

चुप रही मैं,देखती रही मैं ,
मुस्कुरा न सकी,
 खीझ  न सकी
शायद मैं उनको समझ न सकी

खैर गई वो अगले दिन ,धूप  थी चिलचिलाती
और देखा  तो सांझ ढले वापस आई  वो खिलखिलाती
देखा  तो मुख पर ठहाका था
मुंह  में पान और तम्बाकू खा रखा था
चिल्ला उठी सहसा
" मिल गया मिल गया ,
पहला इनाम मुझे ही मिल गया "
"क्या !!" मैं सिर्फ इतना ही कह सकी
शायद चकरा  उठी

फिर हंसकर कहा उन्होंने ,
"निर्णायक समिति देख  रही थी,
मैं स्टेज पर झाड़ू लगा रही थी
खैनी का स्वाद ले रही थी ,
बस जमादारिन का रोले निभा रही थी

चुप थे हम,
 चुप था उनका  परिवार
सिर्फ बोल रही थी वही
पता नहीं आपको पता है या नहीं
कि  वो नारी पत्र कौन थी?
तो सुनिए वो कोई और नहीं
जमादारिन ही नहीं वो मेरी मम्मी ही  थी //






दिनांक २६ -११ -८५

प्यारी मम्मी

चली गई मम्मी नानी के घर
डालकर मुसीबत सर पर
खाना हमने बनाया न था कभी
अतः देखिये मेरा हाल अभी

मम्मी का सारा  कार्य जान लिया
उसी हिसाब से सारा  काम किया
लगता था मानो , जीवन में
 भोजन ही सर्वाधिक ज़रूरी है
क्योंकि हम रोरो पकाते थे
पर थूक थूक सब खाते थे
कभी जल गया
 कभी मन न हुआ
जो भी हुआ,
 हुआ बुरा
मम्मी की याद में हम
आंसू बहाते थे
दिन रात उनके
गुरगान गाते थे //


हाय ये पडोसी

बैठे बैठे छज्जे छज्जे पर से
फेक रहे हमारे सर पे
कूड़ा अपने घर का
मानो सारे दुनिया भर का
आदत के अनुसार है ये
मेरे पडोसी

बन गया मेरे घर का
 बगीचा कूड़ादान अब
घास फूस खूब  लग गया
उसपर सडा पानी जो पड गया
वो भी ऊपर के पडोसी से

कितनी मेहरबानी ,
कितनी कदर
होती है हमारी
काश एक मौका मिले
मदद करने का हमे 
दिखा देंगे उनसे  बढकर हम
भले ही ऊपर चढ कर कदम //


ये कविता मैंने अपने मामा मामी पर लिखी थी जब उनकी शादी हुई थी /
दिनांक ११ -१२ -८५

थी वो रविवार ८ दिसम्बर की रात
लेकर गए हम मामा मामी की बारात
हुई एक से एक मजेदार बात
मामी थी मेरी सखी ,
अतः मेहमान की पहली सीट मुझे मिली

शादी के अवसर पर
हम थे मेरे दोस्त थे ,
सभी थे ,पर ज्यादह
बिन बुलाये मेहमान  ही थे

बारात को देखकर लगा मानो
तुम भी ये जानो
की भारत के सभी किस्म के मनुष्य
 विराजे थे ,
मैं सबको घूर घूर देखती थी
फिर मन ही मन हंसती थी

एक सज्जन खाए चले जा रहे
अपने परिवार के सदस्यों को
मार कर खाना उनके मुंह में
 घुसाते जाते ,
फिर राहत की सांस लेते

मैं उन सज्जन को देख तरस गई
उनपर सारी दया बरस गई ,
बेचारा खाना का कितना दीवाना

हम तो देखते रहे उनको
मानो अप्सरा ही धरती पर उतर आई
गहनों से सजी , सुन्दर वधु
पर हाय !! क्या भूल हुई
वो तो किसी की दादी निकली

अचानक एक तरफ पड़ी नज़र लोग झांक झांक कर
फेक रहे थे अपनी भी नज़र
कोशिश में लगी थे पूरी
बन जाए उनकी विडियो मूवी /

तभी वधु उतर कर आई
ऊपर से नीचे तक सजी सजाई
शुरू हुई शादी , पंडित जी आये
मन ही मन कुछ भाये

शुरू किया पढ़ना  मंत्र ,
मॉडर्न बनकर करा दी शादी
फेरे में एक ,
जो बन गया शादी का पवित्र मेल

हो गई शादी खुश हाल ,
चली बरात , दुल्हनिया के साथ ,
जुग जुग जिए हमारे मामा मामी
यही मेरी कविता की कहानी



हमारे शहर में दूरदर्शन  आया तो वो कुछ ही घरों में लगा था / मोहल्ले के सारे लोग रविवार  के दिन एकत्रित होकर एक ही घर में टीवी दे खते थे

आ तो गया दूरदर्शन घर हमारे
रो पड़े  सज्जन घर के सारे'
आफत या बला हमारे सर पर पड़ा
ये देखो दरवाज़े पर कौन आ खड़ा

पडोसी है ,उसी के नाते
आ सकते है देखने हमारा दूरदर्शन
जो हम कभी न देख पाते
ये है हकीक़त

विराजे है सिंहासन पर सब
पी रहे शर्बते आजम अब
क्या शौर्य आराम है इन्हें
जीना हराम है हमे
ये भी हकीक़त है

समय गुज़रते गया पता न चला
हमने क्या कसूर किया है भला
जो बैठे है दरवाज़े के बाहर
मेहमानों से बना हुआ है सागर

मेरा घर है परन्तु
मैं कर क्या सकती हूँ
 सिर्फ अपने ही बकती हूँ
मेहमानों को घूरती हूँ
फिर खीझ उठती हूँ
दूरदर्शन बंद हो जाता है
फिर वही हमे कुछ न मिल पाता  है
ये है हकीक़त //




Wednesday, August 7, 2013

छोटे भाई के लिए-

मुझे रोना आ जाता है
जब छोटा भैया कहता है
" दीदी मुझे बहुत मारती है,
हर वक़्त बात बात पर डांट ती  है"

इन शब्दों से मेरा गुस्सा इतना पिघल जाता है
कि मुझे रोना आ जाता है
पता नहीं क्यों ,यही उपाय मिला है
छोटो को मना  करने का
बड़े बनकर मानो निभाते है
इसी प्रकार फ़र्ज़ अपना

क्या मैं उसे प्यार से नहीं समझा सकती?
अपना गुस्सा अपनी खीझ ,संभाल  नहीं सकती?
बेहतर यही है की अपना गुस्सा
अपने पर ही उतारकर
उस भैया को दुलार नहीं सकती?



ये कविता  मैंने अपने छोटे भाई पर लिखी है

प्यारा  भैया

 चाँद सा प्यारा भैया मेरा
फूल सा खिल रहे हमेशा
उसका चेहरा

कहता हमेशा " कर दीदी मेरा ये काम"
और खुद करे अपने आराम
दीदी हंसकर कर दे सब और पूछे काम और कब ?

 शैतानी के तो अनगिनत रहें
मनमानी तो रहे अटल
पकडे रहे अपनी जिद को
और रुलाते रहें सबको

कितनी प्यारी सी सूरत भैया की
शरारत से चमकता चेहरा
जिसे देख मन खुश हो मेरा
सबका है ये सलोना प्यारा
ये है न्यारा भैया मेरा

ये नहीं कोई हास्य घटना
परन्तु एक घर की  समस्या
ये शायद आपको भी हो
तो आप ही कहो
"दा ई " की समस्या

आई नहीं एक दिन
सारा घर छिन्न भिन्न
हो न सकता हमसे काम
करना तो है सिर्फ आराम

शुरू करना पड़ा हमे बरतन साफ़
छिल गए सारे हाथ आज
कपड़ो को घिसते घिसते फिर वही दाग दिखते
हमसे तो कभी न मिटते

झाड़ू तो मानो सार घर
बना था फिर भी कूड़ाघर
लगे हम जमीन पोछने
और लगे यही सोचने
काश दा ई आ जाती
वही सब कर पाती
और हमे न रुलाती //




बोकारो क्लब में हर हफ्ते हम पिक्चर देखने जाते थे और एक बहुत गंभीर समस्या से गुज़रते थे

सजधज के चले हम क्लब
घर आ गए मेहमान अब
बैठ गए सब , खड़े रहे हम ,
आ जाने पर हो गया गम
क्यों न हम पहले निकल गए
पर पहले से ये सज्जन विराज गए

आये थे हमे बताने ,
हकीक़त , हमे सताने
की उनके घर आने वाला है दूरदर्शन
फिर भला क्यों करने लगे हमारे दर्शन?

काफी समय बीतने पर ,
वो चले, पीछे पीछे हम निकले ,
जल्दी जल्दी गाडी में फिसले
पहुँच गए हम क्लब

घुसकर लगा मानो ,
तुम भी ये जानो
की भीड़ में ऐसा घमासान
जैसे की सारा  हिन्दुस्तान

जल्दी हम चले बैठने ,
लोग देख हमे, लगे ऐठने
साड़ी सीटें उनकी थीं
हमे कहीं न मिलनी थीं
कहने लगे " बच्चे आयेंगे"
फिर भला हम जगह कहाँ पायेंगे?
 अचानक एक जगह दिखी खाली
हम हंसकर बैठ गए ,
पर तुरंत खानी पड़ी हमे गाली वो सीट
एक सज्जन की थी
जो उनके घर से आयी थी

खड़े हो गए हम अपमानित होकर
खानी पड़ी कितनी ठोकर ,
एक जगह के लिए /

इसी प्रकार सिनेमा ख़तम हो गया
मेरा मूड ऑफ हो गया
हम घर को भागे ,पर उसके आगे
एक मेहमान खड़े  थे घर पर
मानो डालने आये कोई मुसीबत सर पर ,

मेरी धारणा सच निकली
मैं मुसीबत बताना नहीं चाहूँगी
उससे  मैं कुछ न पाऊँगी
आप समझ सके तो क्या कहने
मुझे कुछ नहीं कहना//

ये कविता मैंने अपनी मम्मी और उनकी स्कूल की सहेली पर लिखी है / दोनों को अचानक लगा कि अगर वो नौकरी करेंगी तो घर में उनकी क़द्र भी बढ जाएगी / एक समय आता है जब लगता है कि घर के लोग मम्मी को कुछ नहीं समझते है ,तब ऐसा ही कुछ हुआ /


ये नहीं कोई हास्य घटना
परन्तु एक गंभीर समस्या
दो प्रिय सहेलियों ने विचारा
अपने कर्त्तव्य को उभारा
दोनों बड़ी भोली भाली
स्कूल में नौकरी करने की ठानी

सजधज के चली दोनों एक दिन
विश्वविद्यालय की ओर शनह्शनह
जैसे जैसे स्कूल पास आता गया
उनकी जागरूकता बढती गई
सीडियां पे सीडियां चढ़ ती  गईं
पहुँच गईं वो प्राचार्या के पास

हाँ तो थी वो दोनों सीधी साधी
बनकर गईं वो मॉडर्न वादी
प्रवेश किया कमरे में स आदर
पर हो गया दुखद उनका निरादर

पूछा  प्राचार्या  ने उनसे सवाल
"क्या करने पहुँची हैं बहने आप?"
जवाब दिया गया
"अरे भाई नौकरी चाहिए अध्यापिका की "
यह सुनकर प्राचार्य चकराई
उन दोनों पर गहरी नज़र दौड़ाई
फिर हलके से मुस्कुराई
"अच्छा तो आप चाहतीं हैं पढ़ाना
पर पूछ सकती हूँ  की आपने
खुद क्या है पढ़ा ?"
टेड़े सवाल होते गए,
 जवाब धुलते गए
उत्साह डांवा डोल हुआ
इरादा बदलता गया
अचानक सवालु उठाया गया
" क्या आप अंग्रेजी जानतीं हैं ?"
यहाँ से " नहीं " का सीधा जवाब था
प्राचार्या ने चाहा  फिर भी परखना
पूछे गए अंग्रेजी में प्रश्न
रह गई दोनों सखियाँ सन्न
"यस " "नो " सिर्फ सीखा था
पर उसका भी जवाब देना तीखा था
अतः मूक रहीं दोनों सखी
हो रही थी जो उनकी हँसी
आखिर डांट  फटकार खाने के बाद
दोनों उठी, जल्दी से रिक्शे में बैठी
बिना बोले कुछ ,घर को चली,
लगा उन्हें "अरे नौकरी में क्या पड़ी ,
हम दोनों घर में ही भली"

(1५  -११-८५  को लिखी गई थी ये कविता )



सबसे प्यारी मेरी बहना
बरसा बरसा कर प्यार अपना
चाहती हूँ मैं तुझको ऐसा रूप देना
जो सुगंधित कर दे माहौल पास का
और फिर चले बयार खुशियों और प्यार की

खुशियों से भरा रहे तेरा संसार
नहीं रहे दुःख तुझे देने का हकदार
मुस्कुराता चेहरा खिलखिलाता  प्यार
सर्वदा तेरा रहे पास
आंसू छलक न पाए साथी छूट न जाएँ
तेज़ बयारो से तेरी खुशिया बह न पाए
इसका तू ध्यान रखना
ज़िन्दगी  का तो मतलब ही दुःख सुख है
इंसान भले ही एक को पाने का इच्छुक है
परन्तु मिलता उसे वही है
जिसको वो स्वीकार करने के लिए हमेशा तैयार रहता है

अतः तू ज़िन्दगी को ज्यादह समझने की कोशिश ना कर
परन्तु सिर्फ इतना ध्यान रख
तुझे अपना कार्य करना है पूरा
वही ,जो तेरी ज़िन्दगी में, आगे पड़ा है अधूरा

बहना तेरी याद हमेशा दिल में रहेगी तू मुझे भूलना मत, आंसू बहाना  मत
किसको पता है, ज़िन्दगी ले जाएगी हमे कहाँ तक./

दिनांक ३ -९ -८७
सर्वप्रिय बहना को
 ज़िन्दगी के  ऐसे  मोड़ पर
खड़ी  है बहना तू आकर
जहाँ चलना है तुझे हर पल
हिम्मत और सहनशीलता बटोरकर ,
भावुकता को अपनी त्यागकर
चल तू अपनी मंजिल को तय कर

सोच न तू कभी अकेली है
राह तेरी एक अपनी है
मिलेंगे साथी तुझे नए मोड़ पर
चलेंगे साथ तेरे मंजिल के छोर तक
काटे पड़े मिलेंगे फूल बिखरे दिखेंगे
मुस्काना तुम इन फूलो से
मुरझाना न तुम काटों से
अपना दिल हर्षाकर  साथी को हर्षाना
चलते चलते तू कभी न घबराना, ज़िन्दगी की राह में
मंजिल एक ऐसी तुझे है पाना
जब , गर्व से कहूँ ख़ुशी से कहूँ
गले लगाकर कहूँ
तू ही है मेरी मीना/

दिनांक १ -१ -८६

मैंने ये कविता अपनी छोटी बहन पर लिखी थी / हम दोनों में सिर्फ बारह दिनों  का अंतर है ,बचपन में हम छुट्टियों मे पटना जाया करते थे और हम दोनों मिलकर बहुत हँसते खेलते /मैंने ये कविताये उस वक़्त लिखी थी और आज मैं यहाँ प्रकाशित कर रही हूँ उसी प्यार और भावुकता के साथ/

प्यारी बहना
बहना की दिन रात याद आये
उसे क्या पता मैंने उसके लिए
कितने आंसू बहाए
ये अश्रुकड़ गिरते मेरे
ख्वाबों में पाकर उसे
झूम उठते हम ख़ुशी से
देखकर हो जाते मग्न प्रसन्न
 
आवाज़ में उसकी इतना राग
जैसे कोई वीणा की साज़
गर्व है मुझे वो मेरी बहना है
सबसे अलग वो सर्वप्रिय मीना है /