Thursday, August 8, 2013

हमारे शहर में दूरदर्शन  आया तो वो कुछ ही घरों में लगा था / मोहल्ले के सारे लोग रविवार  के दिन एकत्रित होकर एक ही घर में टीवी दे खते थे

आ तो गया दूरदर्शन घर हमारे
रो पड़े  सज्जन घर के सारे'
आफत या बला हमारे सर पर पड़ा
ये देखो दरवाज़े पर कौन आ खड़ा

पडोसी है ,उसी के नाते
आ सकते है देखने हमारा दूरदर्शन
जो हम कभी न देख पाते
ये है हकीक़त

विराजे है सिंहासन पर सब
पी रहे शर्बते आजम अब
क्या शौर्य आराम है इन्हें
जीना हराम है हमे
ये भी हकीक़त है

समय गुज़रते गया पता न चला
हमने क्या कसूर किया है भला
जो बैठे है दरवाज़े के बाहर
मेहमानों से बना हुआ है सागर

मेरा घर है परन्तु
मैं कर क्या सकती हूँ
 सिर्फ अपने ही बकती हूँ
मेहमानों को घूरती हूँ
फिर खीझ उठती हूँ
दूरदर्शन बंद हो जाता है
फिर वही हमे कुछ न मिल पाता  है
ये है हकीक़त //




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