ये कविता मैंने अपनी मम्मी और उनकी स्कूल की सहेली पर लिखी है / दोनों को अचानक लगा कि अगर वो नौकरी करेंगी तो घर में उनकी क़द्र भी बढ जाएगी / एक समय आता है जब लगता है कि घर के लोग मम्मी को कुछ नहीं समझते है ,तब ऐसा ही कुछ हुआ /
ये नहीं कोई हास्य घटना
परन्तु एक गंभीर समस्या
दो प्रिय सहेलियों ने विचारा
अपने कर्त्तव्य को उभारा
दोनों बड़ी भोली भाली
स्कूल में नौकरी करने की ठानी
सजधज के चली दोनों एक दिन
विश्वविद्यालय की ओर शनह्शनह
जैसे जैसे स्कूल पास आता गया
उनकी जागरूकता बढती गई
सीडियां पे सीडियां चढ़ ती गईं
पहुँच गईं वो प्राचार्या के पास
हाँ तो थी वो दोनों सीधी साधी
बनकर गईं वो मॉडर्न वादी
प्रवेश किया कमरे में स आदर
पर हो गया दुखद उनका निरादर
पूछा प्राचार्या ने उनसे सवाल
"क्या करने पहुँची हैं बहने आप?"
जवाब दिया गया
"अरे भाई नौकरी चाहिए अध्यापिका की "
यह सुनकर प्राचार्य चकराई
उन दोनों पर गहरी नज़र दौड़ाई
फिर हलके से मुस्कुराई
"अच्छा तो आप चाहतीं हैं पढ़ाना
पर पूछ सकती हूँ की आपने
खुद क्या है पढ़ा ?"
टेड़े सवाल होते गए,
जवाब धुलते गए
उत्साह डांवा डोल हुआ
इरादा बदलता गया
अचानक सवालु उठाया गया
" क्या आप अंग्रेजी जानतीं हैं ?"
यहाँ से " नहीं " का सीधा जवाब था
प्राचार्या ने चाहा फिर भी परखना
पूछे गए अंग्रेजी में प्रश्न
रह गई दोनों सखियाँ सन्न
"यस " "नो " सिर्फ सीखा था
पर उसका भी जवाब देना तीखा था
अतः मूक रहीं दोनों सखी
हो रही थी जो उनकी हँसी
आखिर डांट फटकार खाने के बाद
दोनों उठी, जल्दी से रिक्शे में बैठी
बिना बोले कुछ ,घर को चली,
लगा उन्हें "अरे नौकरी में क्या पड़ी ,
हम दोनों घर में ही भली"
(1५ -११-८५ को लिखी गई थी ये कविता )
ये नहीं कोई हास्य घटना
परन्तु एक गंभीर समस्या
दो प्रिय सहेलियों ने विचारा
अपने कर्त्तव्य को उभारा
दोनों बड़ी भोली भाली
स्कूल में नौकरी करने की ठानी
सजधज के चली दोनों एक दिन
विश्वविद्यालय की ओर शनह्शनह
जैसे जैसे स्कूल पास आता गया
उनकी जागरूकता बढती गई
सीडियां पे सीडियां चढ़ ती गईं
पहुँच गईं वो प्राचार्या के पास
हाँ तो थी वो दोनों सीधी साधी
बनकर गईं वो मॉडर्न वादी
प्रवेश किया कमरे में स आदर
पर हो गया दुखद उनका निरादर
पूछा प्राचार्या ने उनसे सवाल
"क्या करने पहुँची हैं बहने आप?"
जवाब दिया गया
"अरे भाई नौकरी चाहिए अध्यापिका की "
यह सुनकर प्राचार्य चकराई
उन दोनों पर गहरी नज़र दौड़ाई
फिर हलके से मुस्कुराई
"अच्छा तो आप चाहतीं हैं पढ़ाना
पर पूछ सकती हूँ की आपने
खुद क्या है पढ़ा ?"
टेड़े सवाल होते गए,
जवाब धुलते गए
उत्साह डांवा डोल हुआ
इरादा बदलता गया
अचानक सवालु उठाया गया
" क्या आप अंग्रेजी जानतीं हैं ?"
यहाँ से " नहीं " का सीधा जवाब था
प्राचार्या ने चाहा फिर भी परखना
पूछे गए अंग्रेजी में प्रश्न
रह गई दोनों सखियाँ सन्न
"यस " "नो " सिर्फ सीखा था
पर उसका भी जवाब देना तीखा था
अतः मूक रहीं दोनों सखी
हो रही थी जो उनकी हँसी
आखिर डांट फटकार खाने के बाद
दोनों उठी, जल्दी से रिक्शे में बैठी
बिना बोले कुछ ,घर को चली,
लगा उन्हें "अरे नौकरी में क्या पड़ी ,
हम दोनों घर में ही भली"
(1५ -११-८५ को लिखी गई थी ये कविता )
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