Sunday, June 19, 2016

This morning when the newspaper was in front of me , my eyes caught the article on Father's day.It read that today's father are mostly "Alpha dads". I got curious and read further. Was it something I could relate to? Yes, everything has been so familiar to me too. It just needs to close my eyes and walk down the memory lane.
         The house of Sector 3D, Bokaro steel city. I was just a little girl. My papa always loves to narrate his memories. I know how special these memories are, to my parents , my brother and to me.
I was just three years old. Every evening , on hearing the noise of Lambretta scooter, I would run carrying the folded newspaper and hide behind the door.My papa would come quietly and look for me.I giggled behind the door.My mummy just smiled at me. Quietly following my papa , I would pat my papa with newspaper in my hand. He would jump with joy.That moment IS HAPPINESS. After a long tiring day, whether it is dad returning from office or child returning from school, husband and wife,the first glimpse of seeing each other is a moment to be felt. A moment of being happy.
Father and daughter have a great bonding. I know it. I can feel this same now with my family too.
In school , I was not good always. sometimes carrying excellent cards sometimes with bad marks. he never shouted at me.He just got sad and that was enough for me to be in tears.He taught me maths, tried his best, did lose his temper at times.My papa has been a good swimmer and won many prizes in Bokaro club too.He made sure that my brother and I also learn swimming. I am writing all this because in today's words he has always been an "Alpha dad".
During Delhi University admissions running from colleges to colleges in scorching heat. That year was tearful. He dropped me in the hostel. He was in tears. I know now that moment IS EMOTIONAL.He had confidence in me . He knew I had to learn more staying away from home.
There was no mobile that time. Once a week I could talk to my parents. I used to get inspiring letters from my papa.His writing is a treasure for me.My friends often got surprised and did ask me "How you can share so much with your dad?" I felt proud.
Engineers cannot sit idle at home.Their house have enough proofs of technical skill. I remember on Sundays my father was busy making a book shelf for me or helping me draw a school project with technical drawing skills. My every painting was put on the wall and that made me feel so encouraged and happy.My mother won many prizes in Mahila Samiti .Once she won for salad dressing because that too had technical hand in that.Family of engineers, still at my home, I experience that.
                 I have countless moments to share.I love remembering every moment spent with my father.Even today when i am married and have a family, I wish to see his same smile , listen to him. Just the day before, my daughter said "Mummy I wish we could go to Bokaro and see nana receiving us on the station."I was so surprised and told her that it was when you were three !
Father and daughter continue to have great emotional bonding. Things may go wrong , failures do happen but with confidence I can proudly say that " Papa is always the strength in the family"
On this father's day, I happily, emotionally and frankly write " I will always be your little daughter".








          

Saturday, May 7, 2016

माँ , जब तुम साथ होती हो,
माँ जब तुम हँसती हो,
सबकुछ अच्छा लगता है
उमड़ता प्यार हमे दिखता है।

बेटी जब तुम बोलती हो,
बातें प्यारी सी  करती हो ,
सबकुछ अच्छा लगता है
गोद में आओ, मन करता है।

बेटे जब तुम स्कूल से आते हो
माँ को देख मुस्काते हो ,
सबकुछ अच्छा लगता है,
खुश रहना यूँ ही ,दिल दुआँ करता है।

Mother's day तो एक बहाना है
special feel कराना है ,
एहसास हर पल इस रिश्ते का
मिलकर करना और मुस्कुराना है।





Friday, May 6, 2016

बोकारो - St. Xavier's School

St. Xavier's स्कूल बोकारो नाम जब जब आया ,
गर्वित हुआ मन , हर्षोल्लास  भर आया ,
चलते चलते आ गए एक पड़ाव पर,
हो गए स्कूल के 'पचास' साल जब,
बाँधा है मैंने बीते समय को
लफ्ज़ो में कुछ, याद करके बचपन के  पलों को।

 St. Xavier's स्कूल जब बना था
बोकारो शहर भी नया था,
सभी माता -पिता का सपना था ,
इसी स्कूल में एडमिशन कराना था।

गुज़रे २५ साल में मैंने ,
जब जब अपने स्कूल का नाम लिया ,
जिसने सुना,जिसने जाना,
आदर सहित एक सम्मान दिया।

प्रेप से लेकर बारवीं तक ,
हर एक टीचर याद है अब तक ,
सबने ऐसा आत्मविश्वास जगाया ,
ज़िन्दगी जीने में वही, हर मोड़ पर काम है आया।

आज फेसबुक पर, हम सहपाठी सब मित्र है ,
व्हाट्सप्प पर भी हम एक ग्रुप है
स्कूल का सफर सबने जो साथ तय किया
सफलता की शिखर पर आज , मिलकर celebrate किया। 

हम सब बच्चे थे, कुछ टीचर से बहुत डरते थे,
Sisters' and Fathers' या फिर Sir and Miss,
अनुशासन कुछ ज़्यादा था , ऐसा पता चला
जब हमारी शीलता को दुनिया ने  चुनौती दिया।

स्कूल का चित्र ऐसे उभर कर है आता ,
झूले, पेड़ , field, classes, library,
labs, cycle stand, dosa stall, assembly,
Principal office, fees counter,prizes,
बहुत कुछ याद , बहुत कुछ नहीं भी याद


बदमाश बच्चे भी कुछ याद है
पिकनिक पर गए , कुएं में कभी,कभी क्लास की
 खिड़की से बाहर भी कोई कूद गया
डांट पड़ती थी, लेकिन शांत बच्चों में  मेरी गिनती थी।

आज अपने स्कूल के हर टीचर को मेरा नमन है
धन्यवाद दिल से मेरा , साथ अपने  माता पिता और भाई को ,
मित्र सभी हम सब आज साथ है ,
सबके मन में एक ही एहसास है  ,
ऐसा स्कूल मिला हमे जो , बोकारो शहर का गौरव जो। .

जैसे हम अनगिनत गिनती गिनते है
पल स्कूल के वैसे हैं
आज भी सपने में Exams हम देते है ,
उम्र मैंने भी जब तय की ,करीब पचास ,
याद करके , गर्व से हम कहते है,

"I am from St. Xavier's Bokaro steel city"
(1974 -1987 ) in school

















Wednesday, March 11, 2015

                                               आज भी अपना बोकारो याद आता है

बोकारो शहर का नाम जब भी जुबान पर है आता
यक़ीनन हमारा मंन वापस उन यादों में, उलझ है जाता
              सुबह सुबह कोयल का कूकना ,
              खुली सड़क पर स्वच्छ  हवा मह्सूस करना ,
              सभी पहचानते चेहरों को नित्य देखना,
              सारा शहर अपना अपना सा लगना ,
आज भी अपना बोकारो याद आता है
               बचपन में सिटी पार्क की ट्रेन  में घूमना ,
               नए साल  पर अक्सर पिकनिक मनाना ,
               राम मंदिर में ' लिमका ' में खाना खाना।
                घूमते घूमते ठेले पर की चाट खाना ,
आज भी अपना बोकारो याद आता है
                पापा मम्मी के साथ स्कूटर पर क्लब जाना ,
                वहां झूलों पर झूलना , पचास पैसे के फिंगर चिप्स खाना ,
                पिक्चर में लम्बी बेंचों पर सीट के लिए झगडना ,
                इंटरवल में गीले गीले दोसे का मज़ा लेना ,
आज भी अपना बोकारो याद आता है
                बेधड़क साइकिल पर घूमना ,
                गेट पर से दोस्तों का आवाज़ लगाना
                दौड़ते  भागते पूरी स्ट्रीट में छुप्पन  छुपाई खेलना ,
                आते जाते सभी बड़ो को नमस्ते करना
आज भी अपना बोकारो याद आता है
                सबके घर एक जैसे ही दिखना ,
                ' रैफेल टिकट 'लेकर सबका दरवाज़ा खटखटाना
                 'एक रुपये 'में   टिकट बेचकर
                 ख़ुशी ख़ुशी घर को जाना
आज भी अपना बोकारो याद आता है
                 संत जेवियर्स से पढ़कर ये जाना
                 सबसे समर्पित अपने टीचर्स को माना,
                  रिश्ता बच्चो से ऐसा बनाया
                 अब भी उनका हाथ सर पर है पाया
आज भी अपना बोकारो याद आता है
                   पापा मम्मी को धन्यवाद हमारा
                   बोकारो को हमारा बचपन जो बनाया
                   दुनिया के किसी भी कोने में हम जाते
                   बोकारो का मित्र जरूर हम है पाते
आज भी अपना बोकारो याद आता है
                    समय था वह एक , जो बीत गया
                     यादें  वह एक खूबसूरत बनकर रह गया
                     दोस्तों , हम सबने ये बात जानी है कि
                     'बोकारो 'शब्द  ही एक पूरी कहानी है
आज भी अपना  बोकारो याद आता है
आज भी अपना बोकारो याद आता है  1
                                                                     -   अंशु सिन्हा




   

Friday, September 20, 2013

Thursday, August 8, 2013

ये हास्य कविता मैंने मम्मी पर लिखी थी ,मम्मी महिला समीति में बहुत सारे प्रतियोगिता में भाग  लेती और इनाम अवश्य लेकर आती / मैं चाहती हूँ  मम्मी आज भी उसी उत्साह से अपने जीवन को जियें , पापा का भी योगदान रहता था उनकी तै यारी करवाने मे// मैं उस वक़्त उनको ध्यान से देखती थी और शायद तभी वो कविता में वर्णन कर डाला

सुनिए सुनिए एक मजेदार किस्सा
 बन गई है किसी के जीवन की
 ये हास्य घटना

उन्होंने, उन्होंने ,
फैंसी ड्रेस में भाग लेने का सोचा
डायलाग का काम अपने
पतिदेव पर सौपा
और खुद एक्टिंग  का काम शुरू किया
घंटा भर अभ्यास किया
तब जाकर एक सुंदर सा
 नारी पात्र  तैयार हुआ

देखा मैंने उनको मटकते हुए
हाथ चमकाते हुए
कानो में झुमका
और बाल बाँ धे हुए

जल्दी से मैंने किये खड़े अपने कान
और पूछा " क्या चल रहा है आज?"
जवाब मिला " जमादारिन"
कल मुझे इसी का पात्र निभाना है
महिला समिति की फैंसी  ड्रेस में जाना है

"कैसा रहेगा?" उन्होंने पूछा
"कैसा रहेगा जब बगल में टोकरी ,
हाथ में झाड़ू  और
साथ में मेरा
मनुआ रहेगा?"

चुप रही मैं,देखती रही मैं ,
मुस्कुरा न सकी,
 खीझ  न सकी
शायद मैं उनको समझ न सकी

खैर गई वो अगले दिन ,धूप  थी चिलचिलाती
और देखा  तो सांझ ढले वापस आई  वो खिलखिलाती
देखा  तो मुख पर ठहाका था
मुंह  में पान और तम्बाकू खा रखा था
चिल्ला उठी सहसा
" मिल गया मिल गया ,
पहला इनाम मुझे ही मिल गया "
"क्या !!" मैं सिर्फ इतना ही कह सकी
शायद चकरा  उठी

फिर हंसकर कहा उन्होंने ,
"निर्णायक समिति देख  रही थी,
मैं स्टेज पर झाड़ू लगा रही थी
खैनी का स्वाद ले रही थी ,
बस जमादारिन का रोले निभा रही थी

चुप थे हम,
 चुप था उनका  परिवार
सिर्फ बोल रही थी वही
पता नहीं आपको पता है या नहीं
कि  वो नारी पत्र कौन थी?
तो सुनिए वो कोई और नहीं
जमादारिन ही नहीं वो मेरी मम्मी ही  थी //






दिनांक २६ -११ -८५

प्यारी मम्मी

चली गई मम्मी नानी के घर
डालकर मुसीबत सर पर
खाना हमने बनाया न था कभी
अतः देखिये मेरा हाल अभी

मम्मी का सारा  कार्य जान लिया
उसी हिसाब से सारा  काम किया
लगता था मानो , जीवन में
 भोजन ही सर्वाधिक ज़रूरी है
क्योंकि हम रोरो पकाते थे
पर थूक थूक सब खाते थे
कभी जल गया
 कभी मन न हुआ
जो भी हुआ,
 हुआ बुरा
मम्मी की याद में हम
आंसू बहाते थे
दिन रात उनके
गुरगान गाते थे //


हाय ये पडोसी

बैठे बैठे छज्जे छज्जे पर से
फेक रहे हमारे सर पे
कूड़ा अपने घर का
मानो सारे दुनिया भर का
आदत के अनुसार है ये
मेरे पडोसी

बन गया मेरे घर का
 बगीचा कूड़ादान अब
घास फूस खूब  लग गया
उसपर सडा पानी जो पड गया
वो भी ऊपर के पडोसी से

कितनी मेहरबानी ,
कितनी कदर
होती है हमारी
काश एक मौका मिले
मदद करने का हमे 
दिखा देंगे उनसे  बढकर हम
भले ही ऊपर चढ कर कदम //


ये कविता मैंने अपने मामा मामी पर लिखी थी जब उनकी शादी हुई थी /
दिनांक ११ -१२ -८५

थी वो रविवार ८ दिसम्बर की रात
लेकर गए हम मामा मामी की बारात
हुई एक से एक मजेदार बात
मामी थी मेरी सखी ,
अतः मेहमान की पहली सीट मुझे मिली

शादी के अवसर पर
हम थे मेरे दोस्त थे ,
सभी थे ,पर ज्यादह
बिन बुलाये मेहमान  ही थे

बारात को देखकर लगा मानो
तुम भी ये जानो
की भारत के सभी किस्म के मनुष्य
 विराजे थे ,
मैं सबको घूर घूर देखती थी
फिर मन ही मन हंसती थी

एक सज्जन खाए चले जा रहे
अपने परिवार के सदस्यों को
मार कर खाना उनके मुंह में
 घुसाते जाते ,
फिर राहत की सांस लेते

मैं उन सज्जन को देख तरस गई
उनपर सारी दया बरस गई ,
बेचारा खाना का कितना दीवाना

हम तो देखते रहे उनको
मानो अप्सरा ही धरती पर उतर आई
गहनों से सजी , सुन्दर वधु
पर हाय !! क्या भूल हुई
वो तो किसी की दादी निकली

अचानक एक तरफ पड़ी नज़र लोग झांक झांक कर
फेक रहे थे अपनी भी नज़र
कोशिश में लगी थे पूरी
बन जाए उनकी विडियो मूवी /

तभी वधु उतर कर आई
ऊपर से नीचे तक सजी सजाई
शुरू हुई शादी , पंडित जी आये
मन ही मन कुछ भाये

शुरू किया पढ़ना  मंत्र ,
मॉडर्न बनकर करा दी शादी
फेरे में एक ,
जो बन गया शादी का पवित्र मेल

हो गई शादी खुश हाल ,
चली बरात , दुल्हनिया के साथ ,
जुग जुग जिए हमारे मामा मामी
यही मेरी कविता की कहानी



हमारे शहर में दूरदर्शन  आया तो वो कुछ ही घरों में लगा था / मोहल्ले के सारे लोग रविवार  के दिन एकत्रित होकर एक ही घर में टीवी दे खते थे

आ तो गया दूरदर्शन घर हमारे
रो पड़े  सज्जन घर के सारे'
आफत या बला हमारे सर पर पड़ा
ये देखो दरवाज़े पर कौन आ खड़ा

पडोसी है ,उसी के नाते
आ सकते है देखने हमारा दूरदर्शन
जो हम कभी न देख पाते
ये है हकीक़त

विराजे है सिंहासन पर सब
पी रहे शर्बते आजम अब
क्या शौर्य आराम है इन्हें
जीना हराम है हमे
ये भी हकीक़त है

समय गुज़रते गया पता न चला
हमने क्या कसूर किया है भला
जो बैठे है दरवाज़े के बाहर
मेहमानों से बना हुआ है सागर

मेरा घर है परन्तु
मैं कर क्या सकती हूँ
 सिर्फ अपने ही बकती हूँ
मेहमानों को घूरती हूँ
फिर खीझ उठती हूँ
दूरदर्शन बंद हो जाता है
फिर वही हमे कुछ न मिल पाता  है
ये है हकीक़त //




Wednesday, August 7, 2013

छोटे भाई के लिए-

मुझे रोना आ जाता है
जब छोटा भैया कहता है
" दीदी मुझे बहुत मारती है,
हर वक़्त बात बात पर डांट ती  है"

इन शब्दों से मेरा गुस्सा इतना पिघल जाता है
कि मुझे रोना आ जाता है
पता नहीं क्यों ,यही उपाय मिला है
छोटो को मना  करने का
बड़े बनकर मानो निभाते है
इसी प्रकार फ़र्ज़ अपना

क्या मैं उसे प्यार से नहीं समझा सकती?
अपना गुस्सा अपनी खीझ ,संभाल  नहीं सकती?
बेहतर यही है की अपना गुस्सा
अपने पर ही उतारकर
उस भैया को दुलार नहीं सकती?



ये कविता  मैंने अपने छोटे भाई पर लिखी है

प्यारा  भैया

 चाँद सा प्यारा भैया मेरा
फूल सा खिल रहे हमेशा
उसका चेहरा

कहता हमेशा " कर दीदी मेरा ये काम"
और खुद करे अपने आराम
दीदी हंसकर कर दे सब और पूछे काम और कब ?

 शैतानी के तो अनगिनत रहें
मनमानी तो रहे अटल
पकडे रहे अपनी जिद को
और रुलाते रहें सबको

कितनी प्यारी सी सूरत भैया की
शरारत से चमकता चेहरा
जिसे देख मन खुश हो मेरा
सबका है ये सलोना प्यारा
ये है न्यारा भैया मेरा

ये नहीं कोई हास्य घटना
परन्तु एक घर की  समस्या
ये शायद आपको भी हो
तो आप ही कहो
"दा ई " की समस्या

आई नहीं एक दिन
सारा घर छिन्न भिन्न
हो न सकता हमसे काम
करना तो है सिर्फ आराम

शुरू करना पड़ा हमे बरतन साफ़
छिल गए सारे हाथ आज
कपड़ो को घिसते घिसते फिर वही दाग दिखते
हमसे तो कभी न मिटते

झाड़ू तो मानो सार घर
बना था फिर भी कूड़ाघर
लगे हम जमीन पोछने
और लगे यही सोचने
काश दा ई आ जाती
वही सब कर पाती
और हमे न रुलाती //




बोकारो क्लब में हर हफ्ते हम पिक्चर देखने जाते थे और एक बहुत गंभीर समस्या से गुज़रते थे

सजधज के चले हम क्लब
घर आ गए मेहमान अब
बैठ गए सब , खड़े रहे हम ,
आ जाने पर हो गया गम
क्यों न हम पहले निकल गए
पर पहले से ये सज्जन विराज गए

आये थे हमे बताने ,
हकीक़त , हमे सताने
की उनके घर आने वाला है दूरदर्शन
फिर भला क्यों करने लगे हमारे दर्शन?

काफी समय बीतने पर ,
वो चले, पीछे पीछे हम निकले ,
जल्दी जल्दी गाडी में फिसले
पहुँच गए हम क्लब

घुसकर लगा मानो ,
तुम भी ये जानो
की भीड़ में ऐसा घमासान
जैसे की सारा  हिन्दुस्तान

जल्दी हम चले बैठने ,
लोग देख हमे, लगे ऐठने
साड़ी सीटें उनकी थीं
हमे कहीं न मिलनी थीं
कहने लगे " बच्चे आयेंगे"
फिर भला हम जगह कहाँ पायेंगे?
 अचानक एक जगह दिखी खाली
हम हंसकर बैठ गए ,
पर तुरंत खानी पड़ी हमे गाली वो सीट
एक सज्जन की थी
जो उनके घर से आयी थी

खड़े हो गए हम अपमानित होकर
खानी पड़ी कितनी ठोकर ,
एक जगह के लिए /

इसी प्रकार सिनेमा ख़तम हो गया
मेरा मूड ऑफ हो गया
हम घर को भागे ,पर उसके आगे
एक मेहमान खड़े  थे घर पर
मानो डालने आये कोई मुसीबत सर पर ,

मेरी धारणा सच निकली
मैं मुसीबत बताना नहीं चाहूँगी
उससे  मैं कुछ न पाऊँगी
आप समझ सके तो क्या कहने
मुझे कुछ नहीं कहना//

ये कविता मैंने अपनी मम्मी और उनकी स्कूल की सहेली पर लिखी है / दोनों को अचानक लगा कि अगर वो नौकरी करेंगी तो घर में उनकी क़द्र भी बढ जाएगी / एक समय आता है जब लगता है कि घर के लोग मम्मी को कुछ नहीं समझते है ,तब ऐसा ही कुछ हुआ /


ये नहीं कोई हास्य घटना
परन्तु एक गंभीर समस्या
दो प्रिय सहेलियों ने विचारा
अपने कर्त्तव्य को उभारा
दोनों बड़ी भोली भाली
स्कूल में नौकरी करने की ठानी

सजधज के चली दोनों एक दिन
विश्वविद्यालय की ओर शनह्शनह
जैसे जैसे स्कूल पास आता गया
उनकी जागरूकता बढती गई
सीडियां पे सीडियां चढ़ ती  गईं
पहुँच गईं वो प्राचार्या के पास

हाँ तो थी वो दोनों सीधी साधी
बनकर गईं वो मॉडर्न वादी
प्रवेश किया कमरे में स आदर
पर हो गया दुखद उनका निरादर

पूछा  प्राचार्या  ने उनसे सवाल
"क्या करने पहुँची हैं बहने आप?"
जवाब दिया गया
"अरे भाई नौकरी चाहिए अध्यापिका की "
यह सुनकर प्राचार्य चकराई
उन दोनों पर गहरी नज़र दौड़ाई
फिर हलके से मुस्कुराई
"अच्छा तो आप चाहतीं हैं पढ़ाना
पर पूछ सकती हूँ  की आपने
खुद क्या है पढ़ा ?"
टेड़े सवाल होते गए,
 जवाब धुलते गए
उत्साह डांवा डोल हुआ
इरादा बदलता गया
अचानक सवालु उठाया गया
" क्या आप अंग्रेजी जानतीं हैं ?"
यहाँ से " नहीं " का सीधा जवाब था
प्राचार्या ने चाहा  फिर भी परखना
पूछे गए अंग्रेजी में प्रश्न
रह गई दोनों सखियाँ सन्न
"यस " "नो " सिर्फ सीखा था
पर उसका भी जवाब देना तीखा था
अतः मूक रहीं दोनों सखी
हो रही थी जो उनकी हँसी
आखिर डांट  फटकार खाने के बाद
दोनों उठी, जल्दी से रिक्शे में बैठी
बिना बोले कुछ ,घर को चली,
लगा उन्हें "अरे नौकरी में क्या पड़ी ,
हम दोनों घर में ही भली"

(1५  -११-८५  को लिखी गई थी ये कविता )



सबसे प्यारी मेरी बहना
बरसा बरसा कर प्यार अपना
चाहती हूँ मैं तुझको ऐसा रूप देना
जो सुगंधित कर दे माहौल पास का
और फिर चले बयार खुशियों और प्यार की

खुशियों से भरा रहे तेरा संसार
नहीं रहे दुःख तुझे देने का हकदार
मुस्कुराता चेहरा खिलखिलाता  प्यार
सर्वदा तेरा रहे पास
आंसू छलक न पाए साथी छूट न जाएँ
तेज़ बयारो से तेरी खुशिया बह न पाए
इसका तू ध्यान रखना
ज़िन्दगी  का तो मतलब ही दुःख सुख है
इंसान भले ही एक को पाने का इच्छुक है
परन्तु मिलता उसे वही है
जिसको वो स्वीकार करने के लिए हमेशा तैयार रहता है

अतः तू ज़िन्दगी को ज्यादह समझने की कोशिश ना कर
परन्तु सिर्फ इतना ध्यान रख
तुझे अपना कार्य करना है पूरा
वही ,जो तेरी ज़िन्दगी में, आगे पड़ा है अधूरा

बहना तेरी याद हमेशा दिल में रहेगी तू मुझे भूलना मत, आंसू बहाना  मत
किसको पता है, ज़िन्दगी ले जाएगी हमे कहाँ तक./

दिनांक ३ -९ -८७
सर्वप्रिय बहना को
 ज़िन्दगी के  ऐसे  मोड़ पर
खड़ी  है बहना तू आकर
जहाँ चलना है तुझे हर पल
हिम्मत और सहनशीलता बटोरकर ,
भावुकता को अपनी त्यागकर
चल तू अपनी मंजिल को तय कर

सोच न तू कभी अकेली है
राह तेरी एक अपनी है
मिलेंगे साथी तुझे नए मोड़ पर
चलेंगे साथ तेरे मंजिल के छोर तक
काटे पड़े मिलेंगे फूल बिखरे दिखेंगे
मुस्काना तुम इन फूलो से
मुरझाना न तुम काटों से
अपना दिल हर्षाकर  साथी को हर्षाना
चलते चलते तू कभी न घबराना, ज़िन्दगी की राह में
मंजिल एक ऐसी तुझे है पाना
जब , गर्व से कहूँ ख़ुशी से कहूँ
गले लगाकर कहूँ
तू ही है मेरी मीना/

दिनांक १ -१ -८६

मैंने ये कविता अपनी छोटी बहन पर लिखी थी / हम दोनों में सिर्फ बारह दिनों  का अंतर है ,बचपन में हम छुट्टियों मे पटना जाया करते थे और हम दोनों मिलकर बहुत हँसते खेलते /मैंने ये कविताये उस वक़्त लिखी थी और आज मैं यहाँ प्रकाशित कर रही हूँ उसी प्यार और भावुकता के साथ/

प्यारी बहना
बहना की दिन रात याद आये
उसे क्या पता मैंने उसके लिए
कितने आंसू बहाए
ये अश्रुकड़ गिरते मेरे
ख्वाबों में पाकर उसे
झूम उठते हम ख़ुशी से
देखकर हो जाते मग्न प्रसन्न
 
आवाज़ में उसकी इतना राग
जैसे कोई वीणा की साज़
गर्व है मुझे वो मेरी बहना है
सबसे अलग वो सर्वप्रिय मीना है /


Tuesday, July 30, 2013


मैंने ये कवितायेँ तब लिखी थी जब मैं बारवी कक्षा में पढती थी !
आज करीब २५ वर्षो के बाद मैंने अपनी डायरी देखी तो खुद यकीन नहीं हुआ की उस वक़्त मैं कितनी भावुक थी
आज कंप्यूटर युग में मैं अपनी कवितायेँ यहाँ लिख रही हूँ ताकि उस वक़्त को मैं याद करके खुश हो सकती हूँ
मैंने अपनी कविताओं में कोई भी एडिटिंग नहीं की है क्योंकि ये सब शब्द मेरे समय के साथ बंधे हुए है
पढकर हंसी भी आती है और आश्चर्य भी होता है   पापा मम्मी पर कविता लिखी थी तो अब लगता है जैसे मेरे बच्चे मेरे लिए ये सब विचार रखते होंगे
मुझे  अपनी कविताओ पर शाबाशी नहीं लेनी है क्योंकि स्कूल छोड़ते वक़्त मुझे फेयरवेल पार्टी में एक कैप्शन मिल गया था" poetess at heart " फिर मैं सबकुछ भूल गई और ज़िन्दगी के दूसरे  पड़ाव पर चलती चली गई
उन्ही खूबसूरत यादों के साथ , बचपन जो मैंने अपने मम्मी पापा के साथ बिताया , आज ख़ुशी ख़ुशी यहाँ  प्रकाशित करती हूँ



Monday, July 29, 2013

आदरनिये पापा जी एवं मम्मी जी को 


खुशियों का उपहार लेकर आयी है तीन फर  वरी ,
मनाने मेरे पापा मम्मी की मैरिज एनिवर्सरी
हर्षोल्लास को बटोर कर आज
बीते हुए समय को कर रहे है याद
हो गए शादी के आज पूरे १८ साल
लिख रहीं हूँ  मैं पापा मम्मी के गुरगान
और आज तक मैंने जितना कुछ जाना
मैंने इन्ही पन्नो पर है लिख डाला
आयिए मिलवाए हम अपने  पापा मम्मी से
फिर पूछिए आप सवाल कोई इनसे,
मम्मी मेरी इतने दयावान
की हर कोई दे इनको, सम्मान ,
और खाए जो इनके हाथों का पकवान
देखिये अगले दिन वही सज्जन यहाँ विराजमान
पर मम्मी की आदत जो गन्दी
झूठ बोलना जो कभी न सीखी ,
घर की कोई भी बात ,जब आ जाये इनके बाज
खोल दे तुरंत  उस ताले का राज़
हिम्मत इनकी है ज्यादा लगती सबसे
कौन करेगा मुकाबला इनसे
बिना डरे कुछ बोलती है , करती है,
और कुछ बिगड़ जाने पर भी उसी काम की ही ज़बरदस्ती है \
आयिए मिलवाए अपने पापाजी से ,
परतु ध्यान से ,
उन्हें तंग न करें , वो अभी है कुछ काम में जुटे
इनकी तो तारीफ ही कीजिये
क्योंकि घर के सभी काम सीखिये
 और अपनी बचत कीजिये \
हैं वैसे पापा कंजूस बहुत
पर घर में मम्मी जो है खर्चालू
सीखो पहले इनसे धीरज रखना
फिर सभी काम आराम से करना
घर पर बैठे हमेशा समझाते रहते
अपने बच्चो को उनकी गलती का एहसास दिलाते
तभी तो कितने सीधे  है इनके बच्चे
जो कभी नहीं पापा से डरते
हाँ पापा को गुस्सा ज़रा जल्दी आता है
पर खुद उनको इसका एहसास होता  है
और अतः जल्दी छू मंतर  हो जाता है
मेरे पापा मम्मी है कितने अच्छे
मेरे जितने भी है भाव व्यक्त होते
लिख डाले है मैंने आज कुछ
एक कविता ही बनाके /

Friday, July 12, 2013

दिन्नांक चौबीस जनवरी छयासी


मान गए हम ,मान जाइए आप
करना ही पड़ेगा आपको यकीन
यही कि मम्मी है मेरी एक
चलती फिरती कामकाजी मशीन

सूर्योदय से पहले  सोकर उठती हैं
फिर र्सुबह का स्वागत शांत दिमाग से करती हैं ,
पलक झपकते ही सबके लिए गरम गरम "बेड टी" हाज़िर करती हैं ,
सबको सोते देखकर मन  गुस्से में उबलता है
जैसे कोई ज्वाला मुखी फटने से पहले , हौले हौले  खौलता है

परन्तु, परन्तु उस समय उनका मुंह बंद रहता है
फिर तो पापा जी मम्मी की  बडबड से डरकर
दूध का डिब्बा लेकर ,लम्बी दौड़ लगा पड़ते हैं
थोड़ी ही देर में दूध हाज़िर कर देते है

मम्मी का चेहरा शांत देखकर
मुख पर मुस्कान ले आते है
परतु वो मुस्कान पल भर के लिए ही होती है
क्योंकि मम्मी अचानक गुस्से में फड़कती हैं

खाना बनाकर , गुस्सा मिलाकर , तीखी चिल्लाहट के साथ
टिफ़िन का डब्बा पकडाती हैं
 और फिर देखिये तो उनके बच्चो  की शामत  आती है

बच्चे उनके इतने आलसी की पूछिए मत
कामचोर और आलसीपने की भी होती है हद
वे बिस्तर पर विराजमान रहकर
मम्मी के कार्यो का नज़ारा देखकर ,
जुम्हाई लेते हैं और वे बिस्तर पर पड़े पड़े नींद को ही बेहतर कार्य समझते है

बस यहीं मशीन तेज़ी से चालू  होती है
 मम्मी बस एक ही आवाज़ में एक ही सुर में चिल्ला चिल्ला कर सारे
काम कर डालती है

एक काम करती हैं दुगुना चिल्लाती है
मानो डांट  से मम्मी रुपी मशीन चलती है
सुबह का कार्य निबटा कर सज सवर कर अवश्य बैठती हैं
बस आईने के सामने ही एक खूबसूरत मुस्कराहट पेश करती हैं

हम तो उनको मुस्कुराते देख कभी कभी ही देखते हैं
परतु फिर अचानक डांट  खाने के लिए तैयार रहते हैं

फिर मम्मी का योगाभ्यास शुरू हो जाता है
आधे ही घंटे  में पूरा अभ्यास हो जाता है
किसी को पता ही नहीं चलता और दोपहर का खाना तैयार हो जाता है
परन्तु  उस समय गुस्से की मिलावट कम होती है क्योंकि
योग करने से दिमाग की शान्ति होती है

शाम हो जाती है लालिमा छा जाती है
मम्मी मेरी सज सवर कर बैठ जाती है
क्लब में इनाम पाने के लिए वो जल्दी क्लब के लिए पापा साथ
रवाना हो जाती है
वापस आकर , मुस्कुराकर,फिर किचन में घुस जाती हैं
बिना कहे कुछ खाना बनाकर ले आती हैं

इस समय तो मुख पर शांत झलगता है
परन्तु घर  में सबका दिल तब भी धड़कता है
मशीन  अब थककर चूर हो जाती है
उसे शायद आराम की महसूस होती है
इसलिए वो गहरी निद्रा में हो जाती हैं
पर इतना ही नहीं नींद में भी वो काम करने का कवाब देखती है , फिर रात में एकाएक
हडबडा कर उठ जाती हैं, यही कहती है
मुझे काम करना है

अरे मम्मी इतना भी क्या काम
अरे ज़िन्दगी में करना ही है तो
फिर मौज मस्ती करो आराम
ये शब्द उनकी ही बेटी , हिम्मत के साथ उनको कहती है