Thursday, August 8, 2013

ये कविता मैंने अपने मामा मामी पर लिखी थी जब उनकी शादी हुई थी /
दिनांक ११ -१२ -८५

थी वो रविवार ८ दिसम्बर की रात
लेकर गए हम मामा मामी की बारात
हुई एक से एक मजेदार बात
मामी थी मेरी सखी ,
अतः मेहमान की पहली सीट मुझे मिली

शादी के अवसर पर
हम थे मेरे दोस्त थे ,
सभी थे ,पर ज्यादह
बिन बुलाये मेहमान  ही थे

बारात को देखकर लगा मानो
तुम भी ये जानो
की भारत के सभी किस्म के मनुष्य
 विराजे थे ,
मैं सबको घूर घूर देखती थी
फिर मन ही मन हंसती थी

एक सज्जन खाए चले जा रहे
अपने परिवार के सदस्यों को
मार कर खाना उनके मुंह में
 घुसाते जाते ,
फिर राहत की सांस लेते

मैं उन सज्जन को देख तरस गई
उनपर सारी दया बरस गई ,
बेचारा खाना का कितना दीवाना

हम तो देखते रहे उनको
मानो अप्सरा ही धरती पर उतर आई
गहनों से सजी , सुन्दर वधु
पर हाय !! क्या भूल हुई
वो तो किसी की दादी निकली

अचानक एक तरफ पड़ी नज़र लोग झांक झांक कर
फेक रहे थे अपनी भी नज़र
कोशिश में लगी थे पूरी
बन जाए उनकी विडियो मूवी /

तभी वधु उतर कर आई
ऊपर से नीचे तक सजी सजाई
शुरू हुई शादी , पंडित जी आये
मन ही मन कुछ भाये

शुरू किया पढ़ना  मंत्र ,
मॉडर्न बनकर करा दी शादी
फेरे में एक ,
जो बन गया शादी का पवित्र मेल

हो गई शादी खुश हाल ,
चली बरात , दुल्हनिया के साथ ,
जुग जुग जिए हमारे मामा मामी
यही मेरी कविता की कहानी



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