Wednesday, August 7, 2013

बोकारो क्लब में हर हफ्ते हम पिक्चर देखने जाते थे और एक बहुत गंभीर समस्या से गुज़रते थे

सजधज के चले हम क्लब
घर आ गए मेहमान अब
बैठ गए सब , खड़े रहे हम ,
आ जाने पर हो गया गम
क्यों न हम पहले निकल गए
पर पहले से ये सज्जन विराज गए

आये थे हमे बताने ,
हकीक़त , हमे सताने
की उनके घर आने वाला है दूरदर्शन
फिर भला क्यों करने लगे हमारे दर्शन?

काफी समय बीतने पर ,
वो चले, पीछे पीछे हम निकले ,
जल्दी जल्दी गाडी में फिसले
पहुँच गए हम क्लब

घुसकर लगा मानो ,
तुम भी ये जानो
की भीड़ में ऐसा घमासान
जैसे की सारा  हिन्दुस्तान

जल्दी हम चले बैठने ,
लोग देख हमे, लगे ऐठने
साड़ी सीटें उनकी थीं
हमे कहीं न मिलनी थीं
कहने लगे " बच्चे आयेंगे"
फिर भला हम जगह कहाँ पायेंगे?
 अचानक एक जगह दिखी खाली
हम हंसकर बैठ गए ,
पर तुरंत खानी पड़ी हमे गाली वो सीट
एक सज्जन की थी
जो उनके घर से आयी थी

खड़े हो गए हम अपमानित होकर
खानी पड़ी कितनी ठोकर ,
एक जगह के लिए /

इसी प्रकार सिनेमा ख़तम हो गया
मेरा मूड ऑफ हो गया
हम घर को भागे ,पर उसके आगे
एक मेहमान खड़े  थे घर पर
मानो डालने आये कोई मुसीबत सर पर ,

मेरी धारणा सच निकली
मैं मुसीबत बताना नहीं चाहूँगी
उससे  मैं कुछ न पाऊँगी
आप समझ सके तो क्या कहने
मुझे कुछ नहीं कहना//

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